- दीपक राजा
फिल्म छावा देखकर लौटा हूं तो मन मस्तिष्क पर कई तरह से प्रश्न उठ रहे हैं. समझ में नहीं आ रहा है कि इस उमड़ते ज्वार को शब्दों में उकेरू तो कैसे? शुरू कहां से करूं? सत्ता पाने के लिए भाई की हत्या करने वाला, पिता को कैद में यातना देकर मारने वाला औरंगजेब कितना क्रूर, निर्दयी रहा होगा, ये छावा फिल्म को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है. हमें मालूम है कि पर्दे पर दिखाई जाने वाल दृश्य फिल्मी है, उसके बाद भी ऐतिहासिक दृश्यों को देखने पर आंखें नम हो रही है. छत्रपति सांभाजी महाराज ने जिसे झेला होगा, उनके परिजनों ने जब सुनी होगी, क्या कर गुजरने का मन करता होगा.
क्रूरतापूर्ण और तड़पा-तड़पाकर, यातना दे-देकर औरंगजेब ने सिखों के गुरु अर्जुनदेव, गुरु तेगबहादुर और गुरु गोविंद सिंह के वीर बालकों को भी मार डाला. फिल्म तो इन यातनाओं पर भी बननी चाहिए ताकि सनद रहे. अरब से आए लुटेरों का इतिहास कैसा रहा है. जो लोग खुद को औरंगजेब को महान बताते हैं, जो लोग खुद को औरंगजेब के वंशज बताते हैं, वे कभी भारत को अपना समझ ही नहीं सकते. ऐसे लोगों को कभी भारत से प्यार हो ही नहीं सकता है. धर्मनिरपेक्ष, भाईचारा, गंगा-जमुनी तहजीब की बात करने वाले सबके सब बेपेंदी के लोटे हैं. और बेपेंदी के लोटे किसी काम के नहीं होते, उन पर भरोसा करना, आ बैल मुझे मार की स्थिति में खुद को खड़ा करना है.
एक सवाल मन में यह भी उठता है कि क्रूस पर इसा मसीह की मौत हुई तो उन्हें दुनिया पूजा करती है. लेकिन छत्रपति संभाजी महाराज को यातना दे-देकर 40 दिनों तक दिन-रात तड़पा-तड़पा कर मारा गया. उनके इतिहास को अब तक छिपाया क्यों गया? इतिहास छिपाने का अपराधी कौन है? अब जब क्रूरता का इतिहास सामने आ रहा है तो हम सबका दायित्व बनता है कि हम अपने इतिहास को जानें, उससे सबक लें और औरंगजेब की सोच रखने वालों से निपटने के लिए खुद को तैयार करें.


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