कहते हैं कि जब भी
कोई विवाद होता है, तो विवाद सुलझाने के लिए समाज में एक संवाद शुरू होता है,
जिससे समाज में जागरूकता आती है. अजान देने और हनुमान चालीसा पाठ करने को लेकर चल
रही होड़ के बीच लाउडस्पीकर का कैसे इस्तेमाल करना चाहिए. लाउडस्पीकर के बेजा
इस्तेमाल को लेकर लोग जागरूक हो रहे हैं. ध्वनि प्रदूषण को लेकर लोगों की सामाजिक
चेतना जगने लगी है.
धीमा जहर है ध्वनि प्रदूषण
ध्वनि प्रदूषण
यानि शोर हमारे जीवन के लिए एक प्रकार का धीमा जहर है. उसका कारण यह है कि लगातार
तेज आवाज सुनते रहने के कारण सुनने की क्षमता प्रभावित होती है, अनिंद्रा की
शिकायत रहने लगती है, रक्तचाप बढ़ने लगता है. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है. इतना
सब होने के बाद आदमी का स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरता चला जाता है.
तभी तो अक्सर
स्कूल में शिक्षक बच्चों को कहते हैं शोर मत करो, अस्पतालों और क्लीनिक में शांत
रहिए या साइलेंट प्लीज का साइनबोर्ड लगा होता है. घर में भी कभी कभार बच्चों को
डांट देते हैं औऱ कहते हल्ला मत करो, शांत रहो, शोर मत मचाओ.
घर और स्कूल में
भले ही बच्चों को डांटकर शोर बंद करा देते हैं लेकिन विकास की सीढ़ियां चढ़ने के
क्रम में, ट्रैफिक से लेकर औद्योगिक कल-कारखानों की कोलाहल को हमने जीवन का हिस्सा
मान लिया है. इसलिए तमाम नियमों और कानूनों का प्रावधान होने के बाद भी, ध्वनि
प्रदूषण साइलेंट किलर की तरह हमारे जीवन की बड़ी समस्या बन रही है.
कैसे मापते हैं आवाज
आवाज कैसी भी हो,
उसे मापने के लिए एक पैमाना है जिसे डेसिबल कहते हैं. इसे संकेत में लिखने के लिए
अंग्रेजी अल्फाबेट स्मॉल डी और केपिटल बी का प्रयोग करते हैं. आवाज मापने के लिए
जो यंत्र यानि मशीन इस्तेमाल होता है, उसे ध्वनि मापक यंत्र यानि ऑडियोमीटर कहते
हैं.
कहां कितनी होती है आवाज?
एक सामान्य
व्यक्ति चाहे तो जीरो डेसिबल की आवाज भी सुन सकता
है. सामान्य तौर पर हम जब घर में बात करते हैं या पेड़ों की पत्तियां सरसरा रही
होती है तब ध्वनि 30 डेसिबल के आसपास होती है. वहीं, ऑफिस में जब जोर-जोर से बात
करते हैं, उस समय ध्वनि की आवाज 70 डेसिबल तक होती है.
मोटरसाइकिल अगर
शोर करने वाली हो यानि बिना साइलेंसर के मोटरसाइकिल की आवाज 80 डेसिबल के आसपास
होती है.
भूमिगत मेट्रो की
आवाज 100 डेसिबल तक होती है.
बारात और
पार्टियों में बैंड-बाजा की आवाज 110 डेसिबल तक की होती है जबकि सायरन की आवाज 130
डेसिबल की होती है.
कितना है ध्वनि प्रदूषण का स्टैंडर्ड
मानक
कान रोग विशेषज्ञ
की मानें तो लगातार 80 डेसिबल की आवाज सुनते रहने से श्रवण क्षमता प्रभावित होती
है जो धीरे-धीरे रोजमर्रा के जीवन और स्वास्थ्य बुरी तरह से प्रभावित करता है.
पर्यावरण मंत्रालय के स्टैंडर्ड मानकों के
अनुसार आवासीय क्षेत्र में दिन के समय में 55 डेसिबल से ज्यादा शोर नहीं होना चाहिए जबकि रात में इसकी सीमा 45 डेसिबल तय की गई है. वहीं,
औद्योगिक क्षेत्र में दिन के समय 75 डेसिबल जबकि रात में 70 डेसिबल से ज्यादा नहीं
होनी चाहिए. शांत घोषित क्षेत्र में दिन के समय 50 तो रात्रि में 40 डेसिबल से
ज्यादा आवाज नहीं होनी चाहिए.
हालांकि, आजकल युवा Earphones का ज्यादा इस्तेमाल करके अपनी सुनने की क्षमता खुद ही खत्म कर रहे हैं.
GFX
ध्वनि प्रदूषण के मानक
क्षेत्र दिन रात
आवासीय 55 45
औद्योगिक 75 70
वाणिज्यक 65 55
शांत क्षेत्र 50 40
नोट – प्रदूषण का मानक डेसीबल में है.
ध्वनि प्रदूषण का दुष्प्रभाव
85 डेसीबल से तेज ध्वनि को प्रदूषण की श्रेणी में रखा गया है. लगातार तीव्र ध्वनि के संपर्क में रहने से कई तरह की शारीरिक व
मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.
ध्वनि प्रदूषण से सबसे पहला असर सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है. इससे धीरे-धीरे सुनने की क्षमता कम होती जाती है. सुनने में बाधा पैदा होने से दैनिक काम भी प्रभावित होते हैं.
आठ घंटे से अधिक 80 डेसीबल या इससे ज्यादा तीव्रता वाली ध्वनि के
संपर्क में रहने पर कान खराब हो सकते हैं.
ध्वनि 50 डेसीबल से अधिक तीव्र हो नींद को प्रभावित होती है.
85 डेसीबल से तेज ध्वनि दिल की धड़कन व रक्त प्रवाह को बढ़ाती है. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है.
तेज ध्वनि के संपर्क में लगातार रहने से हार्ट-अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है.
किसकी कर सकते हैं शिकायत
तेज आवाज, लाउडस्पीकर, प्रेशर हार्न,
फैक्टरी से निकलने वाले शोर, निर्माण कार्य के दौरान होने वाले शोर, जेनरेटर के शोर,
साइलेंसर बदलकर गाड़ियों के शोर और अन्य मशीनों
की तेज आवाज को लेकर ध्वनि प्रदूषण की शिकायत कर सकते हैं.
शोर को लेकर यूज्ड टू है समाज
ध्वनि प्रदूषण को
लेकर हम इतने यूज्ड टू हो गए हैं कि शोर कहीं भी हो, हमें विरोध करने का मन नहीं
करता. चलो एक बार मन कर भी गया विरोध करने का तो अथोरिटी तक शिकायत नहीं कर पाते
हैं. और अगर किसी जागरूक ने शिकायत कर भी दी तो अधिकारी शिकायत को गंभीरता से नहीं
लेते हैं, शिकायतकर्ता को ही समझा-बुझाकर टरका देते हैं. उसी का नतीजा है कि
कुकुरमुत्ते की तरह समाज में उग आया है स्पीकर को लाउड रखने का केंद्र, जिसमें उलझ
गया है देश का संसाधन और तंत्र.
Comments
Post a Comment