गर्भ से शैय्या तक की जो जीवन यात्रा है, वह सामाजिक जीवन में मानव मात्र को फर्श से अर्श तक ले जाता है. इस चराचर जगत में यही जीवन यात्रा इस तपोभूमि पर अपने कर्मों और मानवीय संवेदनाओं से युक्त कार्यों के बल पर मानव मात्र को महापुरुष और महामानव की श्रेणी में ले आता है. बरनवाल वैश्य समाज के सजग प्रहरी और प्रथम जाति रत्न श्रद्धेय डॉ. त्रिवेणी प्रसाद बरनवाल का जीवन कुछ ऐसा ही है. उनकी स्मृति में इस पुस्तक के लिए जो पुण्य अवसर मिला, वह मेरे जीवन के लिए अनमोल है.
ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश भारत में एक तरफ जहां आजादी के लिए आंदोलनों का दौर था, उसी दौर में वैश्य समाज को नई राह दिखाने के लिए त्रिलोकीनाथ महादेव की नगरी वाराणसी में डॉ. त्रिवेणी बाबू का जन्म 13 सितंबर 1904 को हुआ. उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा वाराणसी में ही हुई. वह वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय से आयुर्वेदाचार्य बने. साहित्यिक और सामाजिक गतिविधियों में आपकी अभिरूचि इतनी तीव्र रही कि मात्र 19 वर्ष की आयु में आपको समाज की सामाजिक पत्रिका चंद्रिका जिम्मेदारी दे दी गई. उसी वर्ष 1923 में सनातन की धार्मिक पुस्तक के प्रकाशक गीता प्रेस की नींव गोरखपुर में नींव रखी गई. आपने निर्विवाद रूप से लगातार 35 वर्षों तक पत्रिका की जिम्मेदारी का निर्वहन किया.
महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर आपने कांग्रेस में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई. आपके ओजस्वी भाषण, आपके सारगर्भित आलेख, नित नूतन विचारों के कारण समाज में कुरीतियों को लेकर जागरूकता आई. भिन्न-भिन्न उपनामों से जानी जाने वाले समाज को ‘बरनवाल’ शब्द को अपनाने के लिए आपने प्रेरित किया. भारतवर्षीय बरनवाल वैश्य सभा के आपने हर पद को सुशोभित किया है. संगठन शक्ति के रूप में संघ के आद्य संघचालक प.पू. डॉ. हेडगेवार ने जिस तरह से हिन्दू समाज में अलख जगाई है. डॉ. त्रिवेणी बाबू ने कुछ वैसी ही जागरूकता बरनवाल समाज के बीच में फैलाई. उसी परिणति है कि बरनवाल युवक संघ, बरनवाल महिला संघ, जैसे संगठन के अलावा बरनवाल धर्मशाला वाराणसी, देवघर, पटना और बेतिया के अलावा अन्य शहरों में बरनवाल समाज के भवनों का निर्माण हुआ.
समाज के कार्यों के प्रति समर्पण के चलते, शरीर ने उनका साथ देना कम कर दिया. वह मधुमेह और अन्य व्याधियों से घिर गए. इसके बाद भी वह निरंतर संगठन की चिंता करते रहे. इसके बाद भी दिनचर्या में अनुशासन के पक्के बाबू जी जब तक सक्षम रहे, नियमित रूप से पैदल काशी में गंगा तट पर सुबह स्नान करते रहे. 9 नवंबर 1963 को 59 वर्ष की आयु में वे ब्रह्मलीन हो गए.
त्रिवेणी बाबू के विचार, उनके द्वारा संपादिक पत्रिका, समाज के लिए उन्होंने जो सपना देखा, उसे पूरा करने की जिम्मेदारी समाज की नई पीढ़ी पर है. पुस्तक के प्रारूप को तैयार करने के दौरान, उनके जीवन को जितना समझ पाया, बहुत कम है. मुझे लगता है, उनके जीवन कार्यों को समझने के लिए और शोध करने की आवश्यकता है. त्रिवेणी बाबू की प्रतिमा बरनवाल धर्मशाला वाराणसी में दर्शनीय लगाई गई है. हम सब समाज के सजग लोगों के लिए वाराणसी में गंगा स्नान जितना ही त्रिवेणी बाबू का दर्शन करना अपेक्षित है. मुझे लगता है हर किसी को उनके विचारों और कार्य करने की प्ररेणा का आशीर्वाद अवश्य मिलेगा.
मैंने त्रिवेणी बाबू को नहीं देखा है लेकिन उनके सुपुत्र इंजीनियर सत्यप्रकाश बरनवाल से अवश्य मिला. जब वे बरनवाल वैश्य सभा दिल्ली के महासचिव थे. उनके कार्यकाल में मुझे दिल्ली से प्रकाशित बरन पुंज का संपादन करने का अवसर मिला. चार वर्षों तक पत्रिका के प्रकाशन के दौरान, उनके सरल, सहज और सहृदय व्यवहार के माध्यम से मैंने सदैव आशीर्वाद पाया है. इस पुस्तक के लिए जितना भी त्रिवेणी बाबू की जीवनी को लेकर जान और समझ पाया हूं. अब यह अहसास होता है कि आज जो इंजीनियर साहब के व्यक्तित्व में जो सहजता और अनुशासन के प्रति उनका आग्रह रहता है, वह उन्हें अपने पिताजी मिला है. इनका मेरे प्रति विशेष आशीष और प्यार है कि उन्होंने मुझे पुस्तक पर काम करने अवसर दिया है. ताउम्र इस बात के लिए मैं आभारी रहूंगा कि उन्होंने मुझे श्रद्धेय त्रिवेणी बाबू के जीवन को पढ़ने, जानने और शब्दांजलि देने का अहो भाग्य दिया.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और दीपारती वेलफेयर फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं.)
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