आजकल अजान और हनुमान चालीसा के नाम पर सियासी माहौल गर्माया हुआ है ... इस विवाद के पीछे जो मुख्य कारण है वो है लाउडस्पीकर का बेतरतीब तरीके से इस्तेमाल करना ... धर्म के नाम पर लोग लाउडस्पीकर के जरिए कानफोड़ू आवाज समाज में फैला रहे हैं ... लोग स्वछंद होकर लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कहीं भी, कभी भी की तर्ज पर कर रहे हैं ... इसे ध्वनि प्रदूषण फैलाना कहते हैं ... ध्वनि प्रदूषण करना या फैलाना देश में एक दंडनीय अपराध है ... इसको लेकर अपना एक विधान है ... इस वीडियो में देखिए ध्वनि प्रदूषण के नियमों को लेकर जानकारी -
दोस्तों,
देशभर में अजान और हनुमान चालीसा के बहाने ... लाउडस्पीकर के गलत इस्तेमाल पर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है ... हो भी क्यों नहीं, लोग धर्म की आड़ में कभी भी, कहीं भी लाउडस्पीकर बजाना शुरू कर देते हैं ... तय पैमाने से अधिक तेज आवाज रखते हैं, इससे लोगों की नींद खराब होती है ... क्षेत्र की शांति भंग होती है ... आस्था और धर्म के नाम पर वातावरण में ध्वनि प्रदूषण फैलाया जाता है ... इससे लोगों में सुनने की क्षमता प्रभावित होती है ... लोग बहरेपन के शिकार होते हैं ... लोगों का स्वभाव चिड़चिड़ा होने लगता है ... बीपी और दिल की बीमारी वाले लोगों की धड़कनें तेज हो जाती है ... कई बार ध्वनि प्रदूषण लोगों के लिए जानलेवा साबित होता है ... इसलिए बेतरतीब तरीके से लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर सवाल उठाना लाजमी है...
जैसे जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और भूमि प्रदूषण होता है ... और इसके संरक्षण के लिए पर्यावरण संरक्षण एक्ट 1986 है ... ध्वनि प्रदूषण भी पर्यावरण का एक हिस्सा है ... इसीलिए पर्यावरण संरक्षण एक्ट 1986 के धारा 15 में ध्वनि को लेकर प्रावधान किया गया है. कालांतर में, इसे और स्पष्ट करने कि लिए ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) एक्ट 2000 लाया गया है. इस एक्ट के माध्यम से ध्वनि प्रदूषण करना एक संज्ञेय अपराध माना गया है.. ध्वनि प्रदूषण करने वालों पर गैर जमानती धारा के तहत केस दर्ज होता है. और ध्वनि प्रदूषण करने वालों पर अधिकतम एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है या उन्हें पांच साल की जेल हो सकती है या फिर दोनों सजा साथ-साथ चल सकती है.
ध्वनि प्रदूषण को लेकर इतना कड़ा प्रावधान है, इसके बाद भी हर दिन लोगों को आस्था और धर्म के नाम पर जबर्दस्ती तेज आवाज में लाउडस्पीकर सुनने को बाध्य होना पड़ता है ... लाउडस्पीकर विवाद को हिन्दू-मुस्लिम के चश्मे से देखने वालों को याद रखनी चाहिए ... कि किसी ने ये नहीं कहा कि हनुमान चालीसा पढ़ना बुरा है या अजान देना गलत है ... बस लाउडस्पीकर की आवाज को लाउड रखना बुरा है... तभी मनसे प्रमुख राज ठाकरे भी कहते हैं कि ये धार्मिक नहीं सामाजिक मुद्दा है...
लाउडस्पीकर की आवाज को लेकर, मनसे प्रमुख का दिया गया बयान से अजान को लेकर जो सवाल उठाया है ... वह कोई पहली बार नहीं हुआ है ... इससे पहले गायक सोनू निगम से लेकर अनुराधा पौड़वाल तक उठा चुकी हैं ... विवाद जब बढ़ता है तो मामला कोर्ट पहुंचता है ... और कोर्ट समय-समय पर विवादों पर आदेश भी देती है .. उसके कुछ उदाहरण आपके सामने है ...
मौलाना मुफ्ती सैयद मोहम्मद नुरूल रहमान बरकती बनाम पश्चिम बंगाल सरकार के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने वर्ष 1998 मे एक आदेश दिया ... जिसमें कोर्ट ने अजान को इस्लाम धर्म का अहम हिस्सा माना लेकिन माइक्रोफोन या लाउडस्पीकर को इस्लाम का हिस्सा नहीं माना ... इसी मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा था कि 10 डेसिबिल से ज्यादा की आवाज के साथ कोई भी व्यक्ति या संस्था बगैर अनुमति के लाउडस्पीकर से ध्वनि प्रदूषण नहीं कर सकता ...
इसी तरह वर्ष 2000 में 'चर्च ऑफ गॉड बनाम केकेआर मैजिस्टिक' के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि रात 10 बजे के बाद से लेकर सुबह 6 बजे तक कोई भी ध्वनि प्रदूषण नहीं करेगा ... विशेष परिस्थितियों में जिम्मेदार अधिकारी से अनुमति लेने के बाद ही रात दस बजे से रात को 12 बजे तक लाउडस्पीकर बजाया जा सकता है लेकिन वह भी ... एक तय डेसीबल की अनुमति के साथ ...
एक मामले की सुनवाई में 28 अक्टूबर, 2005 को अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकार अगर चाहे तो एक साल में 15 दिन धार्मिक या किसी त्योहार के दौरान रात 12 बजे तक लाउडस्पीकर बजाने की अनुमति दे सकती है लेकिन इसके लिये भी आवाज एक तय डेसीबल से ज्यादा न हो और उसकी बाकायदा सक्षम अधिकारी से अनुमति ली गई हो ...
बांबे हाईकोर्ट ने वर्ष 2016 में अपने एक फैसले में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को मौलिक अधिकार मानने से इनकार किया...
2018 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तो बाकायदा लाउडस्पीकर बजाने की सीमा 5 से 10 डेसीबल तय कर दिया ...
जुलाई 2019 में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी कहा कि बिना अनुमति के किसी भी धार्मिक स्थल पर लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तो बाकायदा 15 मई, 2020 को अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि मंदिर और मस्जिद में लाउडस्पीकर से होने वाली आवाज दूसरे लोगों के अधिकारों में दखल है... हाईकोर्ट ने कहा था कि अजान इस्लाम का हिस्सा है, लेकिन लाउडस्पीकर से अजान इस्लाम का हिस्सा बिल्कुल नहीं है...
कोर्ट के आदेशों का पालन करना हम सबकी जिम्मेदारी भी है और कर्तव्य भी ... वहीं इसका सख्ती से पालन कराने की जिम्मेदारी प्रशासन की है ... ध्वनि प्रदूषण की शिकायत आने पर इस पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी प्रशासन की है ... ध्वनि प्रदूषण के अपराधियों को सजा दिलाने का काम प्रशासन की है ...
अब सवाल है कि जब कानून रात 10 बजे से लेकर सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकर बजाने की अनुमति नहीं देता है तो धार्मिक स्थलों पर सुबह 5 बजे से अजान या भजन विरोध के बाद भी कैसे बजता है?
बिना अनुमति के पूरे देश में धार्मिक स्थलों पर बजाए जा रहे लाउडस्पीकर के द्वारा लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन कैसे करने दिया जा रहा है?
अब तक ध्वनि प्रदूषण करने वाले लोगों, संस्थानों या फिर धार्मिक स्थल के जिम्मेदार लोगों को शासन प्रशासन द्वारा दंडित क्यों नहीं किया गया?
अगर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी सरकार की है, आदेशों का पालन कराने में नाकाम हुई सरकारी तंत्र को कोर्ट ने दंडित क्यों नहीं किया?
क्या कोर्ट एक्टिविज्म का खेल केवल सनसनी फैलाने के लिए होता है?
अब तक ऐसे मामलों को कोर्ट स्वयं संज्ञान क्यों नहीं लेता है?
लाउडस्पीकर के नाम पर देश में हो रहे धार्मिक उन्माद के लिए कौन है जिम्मेदार?
कौन तय करेगा जिम्मेदारी?
क्या नियमावली और दंड विधान सिर्फ दिखावे के लिए है?

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