- दीपक राजा
भारत एक लोकतांत्रिक देश है और भारतीय संविधान पूरे देश के नागरिकों के लिए राष्ट्रीय पुस्तक है. संसद भवन लोकतंत्र का मंदिर है. इसी लोकतंत्र के मंदिर पर आज से ठीक 20 साल पहले 13 दिसम्बर 2001 को आतंकी हमला हुआ था. इस हमले 14 लोग मारे गए थे. संसद पर हमला देश के लिए अस्मिता पर हमला, राष्ट्र की सुरक्षा चक्र पर प्रश्नचिह्न था. इसको ध्यान में रखते हुए, प्रत्येक साल 13 दिसम्बर को राष्ट्रीय सुरक्षा अवलोकन दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए.
ये दिवस
देश के कर्णधारों को बाह्य और आंतरिक सुरक्षा के प्रति सजग करने का माध्यम बनेगा.
इसे न्यूक्लीयर लेवल पर ले जाकर देखें तो व्यक्ति को परिवार के आंतरिक और बाह्य
सुरक्षा के प्रति सजग होने का माध्यम बनने वाला है. गांव प्रधान अपने पंचायत की
आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के प्रति सजग होने के प्रति संकल्पित रहें. प्रखंड प्रमुख, प्रखंड की तो जिला प्रमुख जिला और प्रांत प्रमुख यानि मुख्यमंत्री प्रदेश की
आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को लेकर सतर्क रहें. 13 दिसंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा अवकलोकन
दिवस के रूप में मनाना, मतलब सुरक्षा को लेकर नए सिरे से विचार करना और उसके प्रति
सतर्क रहना जरूरी है. ये सुरक्षा अवलोकन केवल आंतकी हमले से सुरक्षा करने तक सीमित
नहीं होना चाहिए. इसे बीमारी से बचाव और इलाज, अशिक्षा के अंधकार से रक्षा के लिए
शिक्षा का प्रसार, पर्यावरण की रक्षा से लेकर आमदनी को बनाए रखने के लिए कृत
संकल्पित होने तक, उसका विस्तार होना चाहिए.
राष्ट्रीय
सुरक्षा अवलोकन दिवस मनाने की परंपरा समाज में विकसित होना चाहिए. व्यक्तिगत तौर
पर मैं (दीपक राजा) इस दिन मुंडन कराता हूं और समाज के लोगों के बीच जागरूकता फैलाने का काम कर
रहा हूं. आप चाहें तो इस दिन मेरी ही तरह व्यक्तिगत रूप से जागरूकता फैलाने का काम
करें. या फिर आपका अपना कोई और तरीका हो सकता है. सेमिनार, संगोष्ठी, समूह चर्चा,
डिजिटल मीटिंग, टीवी डिबेट आदि के माध्यम से भी 13 दिसंबर के दिन राष्ट्रीय
सुरक्षा अवलोकन दिवस के रूप में मना सकते हैं. उद्देश्य एक ही है, सुरक्षा के
प्रति सजग रहना और समाज में जागरूकता फैलाना. ये इसलिए ताकि भविष्य में चूक की वजह
से मातम का कोई अवसर न आए. समाज और राष्ट्र का सुरक्षा चक्र हमेशा मजबूत बना रहे,
हमारी अस्मिता की चमक धूमिल न होने पाए,
इसके लिए जरूरी है कि हमें अपनी असफलताओं पर
विचार करना होगा. इसके लिए बहुत जरूरी है कि 13 दिसम्बर को राष्ट्रीय सुरक्षा अवलोकन दिवस के रूप में
मनाया जाए.
क्या हुआ था 13
दिसंबर 2001 को
सामान्य दिनों की तरह ही संसद
में 13 दिसम्बर 2001 को शीत सत्र चल रह रहा था. संसद पर हमला होने
से कुछ देर पहले ही लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित हुई थी. सुबह ग्यारह बजकर
पच्चीस मिनट पर एके-47 बंदूकों और हैंड
ग्रेनेड से लैस पांच अज्ञात चरमपंथियों ने हमला किया. संसद भवन के मुख्य गेट पर
सुरक्षा बलों और अज्ञात हमलावरों के बीच जमकर गोलीबारी हुई. इस गोलीबारी में
पांचों हमलावर मारे गए थे. इसमें कुल नौ लोग शहीद हुए थे. गोलीबारी के दौरान कई
बड़े नेता और सांसद संसद भवन के परिसर में ही थे और सभी सुरक्षित थे. उस समय बीजेपी
के सबसे वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और बीजेपी के नेतृत्व में
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार थी. इस हमले के बाद भारत और
पाकिस्तान के रिश्ते काफी खराब हो गए थे. दोनों देश युद्ध के करीब आ गए थे लेकिन
युद्ध हुआ नहीं. पाकिस्तान के साथ भारत की स्थिति में आज भी बहुत बदलाव नहीं हुआ
है.
किसे हुई थी सजा?
संसद हमले के मामले
जो मुकदमा चला, उसमें दिल्ली की विशेष अदालत ने 2002 में तीन लोगों को मौत की सजा सुनाई थी. उन्हें हमले की
साजि़श में शामिल होने और हमलावरों की मदद करने का दोषी पाया गया था. ये लोग थे
मोहम्मद अफजल, शौकत हुसैन उर्फ गुरु और दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक सैयद
अब्दुल रहमान गीलानी. गुरु की पत्नी नवजोत संधू को भी अदालत ने दोषी
करार दिया था, उसे पांच साल कैद की सजा सुनाई गई थी.
पुलिस का कहना था
कि मोहम्मद अफजल और शौकत हुसैन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े रहे लेकिन 2003 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अब्दुल रहमान गीलानी और नवजोत
को मामले से बरी कर दिया था जबकि मोहम्मद अफजल और शौक़त हुसैन उर्फ गुरू की मौत की
सजा बहाल रखी थी. बाद में, शौक़त हुसैन गुरु को दस साल की सज़ा सुनाई गई जो 2010 में खत्म हो गई.
अफजल गुरु को
फांसी देने के लिए 20 अक्टूबर 2006
का दिन तय किया गया था लेकिन अफजल गुरु ने राष्ट्रपति के पास क्षमादान याचिका भेजी थी.
यह याचिका काफी समय से राष्ट्रपति के पास विचाराधीन रहा। अंतत: तीन फरवरी 2013
को राष्ट्रपति ने उसकी याचिका खारिज कर दी और नौ
फरवरी 2013 को सुबह आठ बजे उसे फांसी
दे दी गई.
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